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Young India Movement....Love Nation Unite With the World....

Young India Movement

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Wednesday, January 25, 2017

गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक संक्षिप्त संदेश:

गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक संक्षिप्त संदेश:

 हमारे देश में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी बसती है. इनके पास अपार प्रतिभा और क्षमता है. आप हर क्षेत्र में सही और गलत के फर्क को तर्कों और तथ्यों के आईने से समझंे. अपनी प्रतिभा और क्षमता का अपने आस-पास के लोगों, अपने समाज के विकास और देशहित में लगायें. आप इतिहास को पढ़ें, अपने देश के और अन्य देशों के भी. अपनी रीति रिवाजों, परंपराओं, विभिन्न संस्कृतियों और कलाओं को जाने, इन्हें वैज्ञानिक तरीके से समझंे, इनमें हुए परिवर्तनो के इतिहास को जाने, समझे. अपने देश और अन्य देशों की आजादी की लड़ाईयां, क्रान्तिकारी परिर्वतनों, वैज्ञानिक खोजों, विभिन्न विचारों और इसमें योगदान देने वाले नायकों को पढ़ें

Friday, May 27, 2016

दो वर्ष का कार्यकाल ! मोदी सरकार का उल्टा चाल !!

दो वर्ष का कार्यकाल !
मोदी सरकार का उल्टा चाल !!

"सुनिए मन की बात"

हमने ये किया, हमने वो किया,
जो उन्होंने साठ साल में भी नहीं किया,
हम ये करेंगे, हम वो करेंगे,
अगर आप 2019 में भी हमें वोट करेंगे,
हमने सबको रोजगार दिया,
गरीबी, भुखमरी मिटा दी,
महिलाओं को उनका अधिकार दिया.
हर खेत को पानी देकर किसानो को खुशहाल बनाया,
शहर की गलियों से लेकर हर गांव तक पीने का पानी और शौचालय दिया,
हमने कहा था, काला धन लायेंगे, भ्रष्टाचार मिटायेंगे,

Wednesday, April 13, 2016

14 अप्रैल, 2016 को डाॅ0 भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयन्ती :

14 अप्रैल, 2016 को डाॅ0 भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयन्ती है. केन्द्र व राज्य सरकारें, कई राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और दलित मुद्दों पर काम करने वाले लोग इस अवसर पर अपने-अपने स्तर से कई तरह के आयोजन कर रहें हैं. कुछ लोगों के लिए यह एक अवसर है अंबेडकर के बहाने दलित समाज के प्रति चिन्ता व्यक्त कर खुद को उनका हमदर्द बताने का, कुछ लोगों के लिए दलित विमर्श को आगे बढ़ाने और संविधान निर्माता के नाम पर उनको याद करने का एक मौका. 

वैसे मेरा मानना है कि दलित समस्यायों को दलित चश्मे के बजाय वर्ग दृष्टिकोण से देखने, समझने और हल करने की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है. अन्यथा यह सिर्फ अंबेडकर जयन्ती दिवस की खानापूर्ती, दलित मुक्ति के नाम पर जातिवादी राजनीति व चिन्तन, मायावती - रामबिलास पासवान और उदित राज जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द आरक्षण और कुल मिलाकर वोट बैंक की राजनीति तक सिमट कर रह जाएगा और मूल समस्यायें जस की तस बनी रहेंगे. 

Shashikant Singh.

Tuesday, April 5, 2016

आईए प्रकृति के साथ मिलकर पानी के लिए आत्मनिर्भर बनें, हमें एक जल क्रान्ति की जरूरत है !!

माननीय प्रधानमंत्री जी, पक्ष-विपक्ष के सभी नेतागण, समाचार चैनलों, सभी समाजिक संगठनों और आम लोगों से अपील,

गैर जरूरी मुद्दों पर हो हल्ला बन्द किजीए !
आईए प्रकृति के साथ मिलकर पानी के लिए आत्मनिर्भर बनें, हमें एक जल क्रान्ति की जरूरत है !!

आज महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड समेत देश के कई हिस्से में पीने के पानी के लिए हाहाकर मचा है. नौबत यहां तक आई कि महाराष्ट्र के लातूर में लोग पीने के पानी के लिए लड़ें नहीं इसके लिए धारा 144 तक लगा दिया गया. खेती-किसानी के लिए तो पानी का संकट पहले से ही कई राज्यों में है. लेकिन पानी सिर्फ गर्मियों में ही तब मुद्दा बनता है जब संकट अपने चरम पर रहता है और समाधान के नाम पर कुछ खानापूर्ति कर दिया जाता है. लेकिन ऐसी स्थिति में तो यह संकट हर गर्मी के मौसम में और बढ़ता ही जाएगा और कुछ वर्षों में अत्यन्त भयावह रूप ले लेगा. नदियों का जल स्तर कम हो रहा है, वे सूख रहें है, शहर हो या गांव हमारे डैम, तालाब, कुआं, चापानल सूख रहें हैं. एक तरफ पानी के सभी प्राकृतिक साधनो में कमी आ रही है वहीं हम जान-बूझकर पानी के स्रोतों को प्रदूषित भी कर रहें हैं, उसे जहर बना रहें हैं. गंगा की हम पूजा तो करते हैं लेकिन उसकी स्थिति भी सब जानते हैं. शहरों के तालाबों, आस-पास की नदियों में नालियों का पानी और हर तरह का औद्योगिक कचरा बहाया जा रहा है. प्रकृति के साथ मुनाफे के लिए मानवीय खिलवाड़ ने मौसम चक्र को पहले ही इतनी बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है कि जब पानी की जरूरत होती है तो बारिश नहीं होती और जब खेतों में फसल पकती है, पानी की जरूरत नहीं होती है तो बेमौसम बारिश से फसल खराब हो जाती हैं. बाढ़-सूखा का खेल तो चलता ही रहता है.

Monday, February 29, 2016

Union Budget 2016- 17: No Vision for Growth

In the backdrop of global economic slowdown the budget should have increased measures that enhance domestic demand. Instead it chose to continue with the same regressive policies that are contractionary. This would aggravate inequality, unemployment and further contract exports. It would lead to increasing distress in agriculture and the countryside, the collapse of industrial production, the slowdown in construction activities and many services.

Thursday, February 25, 2016

23 मार्च, भारत - पाक एकता दिवस के रूप में मनायें..

.आतंकवाद, साम्राज्यवाद और विभाजनकारी समूहों के विरूद्ध
23 मार्च, भारत - पाक एकता दिवस के रूप में मनायें...


भारत और पाकिस्तान के लोगों से अपील है कि भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत दिवस 23 मार्च को आतंकवाद, साम्राज्यवाद और विभाजनकारी समूहों के विरूद्ध भारत-पाक एकता दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए.........................अब यह विचार कुछ लोगों को थोड़ा अटपटा लग सकता है. लेकिन यह एक विचार है, किन्हीं को अच्छा न लगे पर कुछ लोग तो जरूर इस विचार से भी सहमत हो ही सकते हैं. खैर जो भी हो इतना तो सच है कि दोनों ही मुल्कों की सरकारों ने भले ही भगत सिंह और उनके विचारों को अब तक हासिए पर रखने की कोशिशें की हों लेकिन जनमानस के दिलों से अलग नहीं कर पाये हैं. ऐसे में भगत सिंह को हम दोनों मुल्कों के लोगों के बीच एकता की एक कड़ी के रूप में देखने का प्रयास कर सकते हैं.

Thursday, February 11, 2016

Tilka Manjhi

Tilka Manjhi was the first Tribal leader who took up arms against the British Rule in the 1784. . He organized tribals to form an armed group to fight against the resource grabbing and exploitation.
The year 1784 is considered as the first armed rebellion against the British and was the beginning of Santhal Hul. It was due to great famine in 1770 and the consequences of Court of Directors orders influenced by William Pitt the Younger -- Court of Director issued ten year of the settlement of Zamindari and later in 1800 - this resulted in minim chance to negotiate between local Zamdindars and Santhal villagers. Baba Tilka Majhi attacked Augustus Cleveland, British commissioner [lieutenant], and Rajmahal with a Gulel (a weapon similar to slingshot) who died later. The British surrounded the Tilapore forest from which he operated but he and his men held them at bay for several weeks. When he was finally caught in 1784, he was tied to the tail of a horse and dragged all the way to the collector's residence at Bhagalpur, Bihar, India. There, his lacerated body was hung from a Banyan tree. A statue to him was erected at the spot where he was hanged, after Indian independence, which is nearby residence of S.P. Bhagalpur and named after him. Also the Bhagalpur University was renamed after him - Tilka Majhi Bhagalpur University.

Tuesday, January 19, 2016

इस भयावह आर्थिक गैर बराबरी का जिम्मेवार कौन ?


इस भयावह आर्थिक गैर बराबरी का जिम्मेवार कौन ?

औक्सफैम एक अन्तर्राष्ट्रीय स्वयसेवी संस्था है जो हर वर्ष जनवरी माह में वैश्विक स्तर पर गरीबी के आंकड़ों का रिपोर्ट पेश करती है. हाल में आई इसकी रिपोर्ट में चैंकाने वाला कुछ भी नहीं बल्कि वास्तविक स्थिति तो इससे भी बदतर हो सकती है. औक्सफैम की रिपोर्ट कहती है कि दुनियां के सबसे धनवान एक प्रतिशत लोग 99 प्रतिशत लोगों से ज्यादा धनवान है. रिपोर्ट के अनुसार दुनियां के 62 सबसे धनी लोगों के पास दुनिया भर के गरीबों की 50 प्रतिशत आबादी के बराबर धन संपदा है. जहां 2010 के बाद इन धनवानों की संपत्ति 500 अरब डाॅलर से बढ़कर 1,760 अरब डाॅलर हो गई वहीं इसी दौर में दुनिया के सबसे गरीब आबादी में से 50 प्रतिशत की संपत्ति 41 प्रतिशत कम हो गई. जहां तक भारत की बात है तो पिछले वर्ष अक्टूबर में जारी क्रेडिट स्विस की रिपोर्ट के अनुसार भारत के एक प्रतिशत सबसे धनी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति में 53 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. वहीं सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों के पास यह हिस्सेदारी 73.30 प्रतिशत है. इसका मतलब बिलकुल साफ है कि वर्ष दर वर्ष आर्थिक गैर बराबरी की खाई और चैड़ी होकर धन-संपदा कुछ परिवारों तक सिमटती जा रही है और गरीबी के आंकड़ों में इजाफा हो रहा है.


अब सवाल है कि लगातार बढ़ती इस आर्थिक विषमता के लिए जिम्मेवार कौन है. इसके लिए आर्थिक-राजनीतिक जानकारों के अलग-अलग तर्क हो सकते है लेकिन इतना साफ है कि आज हम विकास के जिस आर्थिक माॅडल के बोझ को ढो रहें हैं उसका नतीजा हमारे सामने है जिसे शर्मनाक कहा जा सकता हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक और रिपोर्ट के मुताबिक वर्षं 2014-15 में भारत में करीब 19 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर खड़े थे जो उस समय विश्व की सर्वाधिक संख्या थी.............जबकि हमारी सरकार काॅरपोरेट जगत को करीब 5 लाख करोड़ की छूट केवल टैक्सों के माध्यम से दे रही है. भारत जैसे देश में यह चिन्ता का विषय इसलिए भी है कि हमारी सरकारें रोजपरक शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार गांरटी के नाम पर अपने बजट में नाम मात्र का हिस्सा देती है बल्कि गरीबों को राहत देने वाली कुछ सेवाओं में तो कमी ही की जा रही है. सवाल सिर्फ बजट के प्रावधानों का नहीं बल्कि मानसिकता और विचारों का भी है. गरीबी उन्मूलन के नाम पर ढोंग करते हुए हमारे नीति निर्धारक जमात बड़ी संख्या में मिल जायेंगे. हमारे देश में गरीबी की परिभाषा और उसका आर्थिक आधार ही हमारे नीति निर्धारकों के मानसिक दिवालियापन और गरीबों को तुक्ष समझने की प्रवृति को ही दर्शाता है. किसानों की बढ़ती आत्महत्या, उपेक्षापूर्ण रवैया के कारण कृषि से होता मोहभंग, रोजगार के अभाव में शहरों की ओर पलायन की बाढ़ से शहरों में सस्ते श्रम और बेरोजगारों की भीड़ यह सब वर्तमान आर्थिक नीतियों की देन है जिसे हम नवउदारवादी आर्थिक नीतियां कहते हैं जिसका कि वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी खुला समर्थन है. बल्कि नरेन्द्र मोदी सरकार तो इन नीतियों को ऐसे लागू कर रही है जैसे की किसी सवारी का ट्रेन छूट रहा हो. आज हमारी देश की स्थिति यह है कि ग्रामीण भारत का 80 प्रतिशत आबादी और शहरी भारत का 70 प्रतिशरत आबादी अत्यन्त गरीब है. शहरों में झुग्गी झोपड़ियों की बढ़ती बाढ़ और गांवों में फसलों से सूना होता खेत हमारे नीति निर्धारकों को नहीं दिखता. एक किसान 5 हजार कर्ज के कारण आत्महत्या कर लेता है वहीं बैंको के करोड़ों अरबों डकारने वाले हजारों बड़े डिफाल्टर है जिनपर बैंक कोई कार्यवाई नहीं करते क्योंकि ये बड़े लोग है. रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराजन को भी कहना पड़ा कि हमारे देश में कानून सिर्फ गरीबों के लिए है बड़े लोग कानून से बच निकलते है. 

यह मांग लगातार उठ रही है कि सरकार न्यूनतम मजदूरी की दर कम से कम 15 हजार करे, सबको जनवितरण प्रणाली के साथ जोड़ा जाय, गरीबी रेखा को पुर्नपरिभाषित कर एक सम्मानजनक स्थिति तक लाया जाय, शिक्षा सबके लिए एक समान और सुलभ हो. लेकिन सरकार इन बुनियादी बातों को भूल एक ऐसा हवा महल खड़ा करने में लगी है जो एक झोंके में ही तहस नहस हो जाएगी. इस बात को जानते हुए भी कि अमेरिका जैसा देश और कई यूरोपीय देष जिस आर्थिक मंदी से दहल उठे थे, उसका ज्यादा असर हमारे देश में सिर्फ इसलिए नहीं हुआ था कि यहां की अर्थव्यवस्था पर सार्वजनिक क्षेत्र का दबदबा है. इसके बाद भी सरकार इन सार्वजनिक क्षेत्र में मुनाफे की लूट के लिए जबरन विदेशी निवेशकों को ला रही है जिसका भविष्य में नकारात्मक असर देखा जाएगा. दूसरी ओर हमारे यहां वेतन मंे भी काफी विसंगतियां है. एक तरफ सरकारी पदों में लाखों का भी वेतन है तो वहीं कई सरकारी क्षेत्र मसलन शिक्षा, स्वास्थय में वेतन के नाम पर नाम मात्र का मानदेय दिया जाता है औज्ञर ठेका प्रथा, आॅटर्सोसिंग के माध्यमों से कम वेतन पर काम कराया जाता है. नीजि क्षेत्र को तो सरकार इतना छूट देने जा रही है कि वहां मजदूरों के लिए अपनी मांग उठाना भी अपराध हो जाएगा. आज केन्द्र सरकार मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, मुद्रा  बैंक, कृषि बीमा पर लाख अपना सीना पीट ले लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह वही सरकार है जिसके मुखिया चुनाव पूर्व सीना ठोक कर सभी के खाते में 15 लाख देने की बात कर रहे थें. लेकिन सत्ता में आते ही सारा काला धन सफेद हो गया.  

औक्सफैम की रिपोर्ट पर कुछ एक - दो चैनलों को छोड़ ज्यादातर चैनलों से गंभीर चर्चा की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती है लेकिन इस रिपोर्ट से मुह भी नहीं फेरा जा सकता है. आज हम भले ही देश को एक उभरते हुए वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करें लेकिन सच्चाई यही है कि यह चेहरा सिर्फ एक प्रतिशत लोगों का है 99 प्रतिशत लोगों का वास्तविक चेहरा दिखाने में सरकरों को शर्म आती है............लेकिन ये आंकड़े आंख खोलने वाले भी है. हमें समझना होगा कि दुनियां समेत भारत जैसे देष में एक प्रतिषत लोगों का ना तो कोई र्धम है, ना ही कोई जाति और ना ही वे किसी क्षेत्र विषेष का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनका तो बस एक ही धर्म है और वह है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा. लेकिन 99 प्रतिषत लोग धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर बंटे हैं और सरकारें इन्हें बांट कर रखना भी चाहती है. लोग गरीबी के आंकड़ों पर ज्यादा माथापच्ची न करें इसके लिए सरकारें समय-समय पर ऐसे मुद्दे उछालती रहती है जिसका कि हमारी रोजी-रोटी, एक बेहतर जीवन से कोई मतलब नहीं है और ना ही जिनका कोई अर्थपूण तार्किक   आधार होता है. बहरहाल जो भी हो इन आंकड़े ने एक प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत के बीच एक लकीर खींच दी है. जरूरत है इसका मुकाबला करने का और साहस कर यह कहने का कि कुछ तो शर्म करो !

शशिकान्त सिंह.

Friday, May 15, 2015

'' उनके लिए ''

मैं नहीं मान सकता
उन्हें जानवर !
उनकी तरह,
या फिर दया का पात्र
इनकी तरह.

उन्हें चाहिए अधिकार,
इन्सान बने रहने का,
कुछ सपने,
सभ्य इन्सानों की तरह.

मैं भी कहता हॅंू, कुछ !

Friday, May 8, 2015

तीन बातें सलमान की सजा और बिना जेल जाये बेल पर !

1. सेलिब्रेटियों, बड़े लोगों, नेताओं को भ्रष्टाचार, हत्या-गैर इरादतन हत्या जैसे कई आपराधिक मामलों में 50 प्रतिशत की छूट दे ही देनी चाहिए ताकि इनके शिकार लोग 12-15 वर्षों तक न्याय की आस में भटकने के बजाय यह तसल्ली कर लें कि सेलिब्रेटियों, बड़े लोगों, नेताओं को तो कई आपराधिक मामलों में कानूनन 50 प्रतिशत की छूट है. इससे न्यायालय का समय बचेगा और कुछ किमती आंसू जिन पर करोड़ों के दांव लगे रहते हैं वे भी बच जायेंगे. हां यहां उन सट्टेबाजों को जरूर नुकसान होगा जो सुनवाई के दिन रिहाई और सजा पर करोड़ों का सट्टा लगाते हैं. वैसे वेे इस पर सट्टा लगा सकते हैं कि कौन कितना बड़ा अपराध कर सकता है !................

Friday, May 1, 2015

आज अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस है

आज अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस है.

आज श्रम को पूंजी की सत्ता से मुक्ति दिलाने, श्रम की गरिमा को पुनः स्थापित करने, शोषण के विरूद्ध संघर्ष की चेतना को जागृत करने, श्रम को मानव समाज के निर्माण की मूल प्रेरणा व संचालक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापित करने का संकल्प लेने का दिन है. लेकिन क्या आज के दौर में रोज खटने कमाने वाले उन लाखों करोड़ों मजदूरों के लिए इस दिन का कोई व्यवहारिक महत्व है ? ठीक है कई संगठन, मजदूर नेता आज रैली निकालेंगे, भाषण देंगे, मजदूर दिवस के गौरवशाली इतिहास को याद दिलायेंगे, अखबारों में विज्ञापन देंगे और अगले दिन अखबारों में अपनी तस्वीर और समाचार तलाशेंगे....................

Wednesday, April 22, 2015

राजनीति में शर्म क्यों नहीं आती ?

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की किसान रैली में तंगहाली से तंग राजस्थान के एक किसान ने पेड़ में फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली !!!

इस घटना को लेकर किसी पर आरोप-प्रत्यारोप करने से बेहतर है कि सरकार से अपील की जाय कि देश के ससंद के सामने एक स्थायी फांसी का फंदा बनाकर वहां आत्महत्या करने की अनुमति दी जाय ताकि देश के गरीब किसान, गरीब मजदूर, व्यवस्था से थके-हारे लोग, न्याय और लोकतंत्र की परिभाषा तलाशती वैसी तमाम अनसुनी आवाज जो राजनीति के महज मोहरा भर हैं, वे आकर लोकतंत्र के सबसे बड़े मन्दिर ! के सामने इस तस्सली के साथ आत्महत्या करें कि शायद कभी उनके मरने के बाद उनके परिवार वालों को कुछ मुआवजा मिल जाय और उनके तरह के अन्य लोगों को कभी न्याय मिल जाय...........

Wednesday, April 15, 2015

Where is the right place for anti nation and separatist Masrat Alam and his terrorist supporters ?





16 April, 2015 : Supporters of separatist Masarat Alam, who was controversially released from prison recently, waved Pakistani flags,  raised anti India and pro-Pakistan slogans at a rally in Srinagar on 15th April.

Masarat Alam, is allegedly the main organiser of the massive protests in 2010 that saw Kashmiris clashing for months with Indian soldiers and police officers. More than 100 people were killed in the violence. He was released controversially from Baramulla jail in March, days after the People's Democratic Party or PDP's Mufti Mohammad Sayeed took over as chief minister of Jammu & Kashmir.

Friday, March 27, 2015

Say No to Child Trafficking





Trafficking as a phenomenon has been defined by the UN general assembly in 1994 as: “the illicit and clandestine movement of a person across national and international borders, with the end goal of forcing women and girl children into economically oppressive and exploitative situation for the profit of the recruiters, traffickers, as well as other illegal activities such as forced domestic labour, clandestine employment and forced adoption.”

Wednesday, March 18, 2015

कुछ सवाल:

कुछ सवाल:




केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार किस राजनीतिक दल या गठबंधन के शासनकाल में,

* किसानों और गरीबों की जमीन सबसे ज्यादा ली गई.............
* सबसे ज्यादा किसान मजदूर बनने के लिए बाध्य हुयें................
* लाखों विस्थापितों को ना ही मुआवजा दिया गया और ना ही उनका पुर्नवास किया    गया..............
* किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की.......................
* किसानो को उनके पैदावार का उचित समर्थन मूल्य नहीं मिला................
* भूमि सुधार के कार्यक्रम नहीं चलाये गये..................
* सुदूर गांवों तक बिजली-पानी-शौचालय उपलब्ध कराने को प्राथमिक मुद्दा नहीं बनाया गया..................

Tuesday, March 17, 2015

Homelessness



Homelessness….…


They have  no Home
No any Identity Card
So they have not been covered in any social or economical security schemes………..
Finally they have nothing to prove that they are citizen…..
But they needs
Rehabilitation, Social & Economical Security and Dignity of being human being……

Universal Declaration of Human Rights, article 25, par. 1

"Everyone has the right to a standard of living adequate for the health and well-being of himself and of his family, including food, clothing, housing, medical care, necessary social services, and the right to security in the event of unemployment, sickness, disability, widowhood, old age or other lack of livelihood in circumstances beyond his control." 

Friday, February 27, 2015

Chandra Shekhar Azad (23 July 1906 – 27 February 1931)
















Lets Salute Chandrasekhar Azad, 
one of the greatest freedom fighter of country.

One of the torchbearers of the revolutionary struggle against the British, Chandrasekhar Azad was born on July 23, 1906 in the Bhabhra village in Madhya Pradesh. It was during his teenage days that Chandrasekhar adopted the sobriquet of 'Azad' which stands for 'free' in Urdu. Consequent to this, Azad vowed that he would never be taken alive by the British and would instead fight till his last breath.

Friday, February 20, 2015

तथाकथित समाजवादियों ! का शाही तिलक: क्या प्रधानमंत्री का जाना उचित है ?

तथाकथित समाजवादियों ! का शाही तिलक: क्या प्रधानमंत्री का जाना उचित है ?

यहीं विचारों की अवसरवादिता और खोखलापन सामने आता है. जो लोग सीना ठोक कर सामाजिक न्याय, गरीबों, दलितों, दबे कुचलों, पिछड़ों की राजनीति की बात करते हैं दरअसल ये सब बाते उनके लिए सत्ता में आने या बने रहने का साधन मात्र होता है. आज गरीबांे की कितनी ही बेटियों की बारात पैसों के अभाव में लौट जाती हैं, मासूम औरतें दहेज हत्या की बलि चढ़ जाती हैं, एक बूढ़ा बाप अपनी बेटी की शादि न कर पाने की असमर्थता में दिनों - दिन घुटता रहता है, देश में लाखों-करोड़ों लोग ऐसे हैं जो दहेज जैसे कुरितियों के कारण बेटी पैदा होने पर उसे न चाहते हुए भी बोझ समझने लगते हैं. यह एक सच्चाई है जिसे किसी गरीब पिता से जाकर पूछिये जवाब मिल जाएगा.

Wednesday, February 18, 2015

प्रधानमंत्री का सूट !

प्रधानमंत्री का सूट ! और समाचार चैनलों/अखबरों/सोशल साईटों में चिरकुट नेताआंे की मुद्दों से परे बचकाना बहसों पर त्वरित प्रतिक्रिया:

Saturday, February 14, 2015

Please don’t spread rumors in the name of our great martyrs Saheed Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru.




According to Indian Law Journal, on 7 October 1930, the tribunal delivered its judgement, sentencing Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru to death by hanging. But few people are spreading rumors on social sites (Facebook) that the judgment came on 14 February…………. 



Read the whole backdrop of the trial…………….