माननीय प्रधानमंत्री जी, पक्ष-विपक्ष के सभी नेतागण, समाचार चैनलों, सभी समाजिक संगठनों और आम लोगों से अपील,
गैर जरूरी मुद्दों पर हो हल्ला बन्द किजीए !
आईए प्रकृति के साथ मिलकर पानी के लिए आत्मनिर्भर बनें, हमें एक जल क्रान्ति की जरूरत है !!
गैर जरूरी मुद्दों पर हो हल्ला बन्द किजीए !
आईए प्रकृति के साथ मिलकर पानी के लिए आत्मनिर्भर बनें, हमें एक जल क्रान्ति की जरूरत है !!
आज महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड समेत देश के कई हिस्से में पीने के पानी के लिए हाहाकर मचा है. नौबत यहां तक आई कि महाराष्ट्र के लातूर में लोग पीने के पानी के लिए लड़ें नहीं इसके लिए धारा 144 तक लगा दिया गया. खेती-किसानी के लिए तो पानी का संकट पहले से ही कई राज्यों में है. लेकिन पानी सिर्फ गर्मियों में ही तब मुद्दा बनता है जब संकट अपने चरम पर रहता है और समाधान के नाम पर कुछ खानापूर्ति कर दिया जाता है. लेकिन ऐसी स्थिति में तो यह संकट हर गर्मी के मौसम में और बढ़ता ही जाएगा और कुछ वर्षों में अत्यन्त भयावह रूप ले लेगा. नदियों का जल स्तर कम हो रहा है, वे सूख रहें है, शहर हो या गांव हमारे डैम, तालाब, कुआं, चापानल सूख रहें हैं. एक तरफ पानी के सभी प्राकृतिक साधनो में कमी आ रही है वहीं हम जान-बूझकर पानी के स्रोतों को प्रदूषित भी कर रहें हैं, उसे जहर बना रहें हैं. गंगा की हम पूजा तो करते हैं लेकिन उसकी स्थिति भी सब जानते हैं. शहरों के तालाबों, आस-पास की नदियों में नालियों का पानी और हर तरह का औद्योगिक कचरा बहाया जा रहा है. प्रकृति के साथ मुनाफे के लिए मानवीय खिलवाड़ ने मौसम चक्र को पहले ही इतनी बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है कि जब पानी की जरूरत होती है तो बारिश नहीं होती और जब खेतों में फसल पकती है, पानी की जरूरत नहीं होती है तो बेमौसम बारिश से फसल खराब हो जाती हैं. बाढ़-सूखा का खेल तो चलता ही रहता है.





